हो मन मेरा भगीरथ सा

हो मन मेरा भगीरथ सा

अहंकार का नाश हो,

ज्ञान की वहे पावन सरिता

जन्म लूं भारत में ही मैं

हो मन मेरा भगीरथ सा ।।

 

संकल्पित हो जीवन ये ,

कर्म हेतु हो निज निष्ठा

व्याकुल न रहे मन प्रभु

हो मन मेरा भगीरथ सा ।।

 

भक्ति का हर भाव मिले

प्रेम रस रहे ये निर्मल सा,

अमृत बूंद गिरे इस मन में

हो मन मेरा भगीरथ सा ।।

 

राग द्वेष सब दूर रहे मुझसे

नहीं किसी से हो मुझे घृणा

लगाऊं डुबकी भक्ति रस में

हो मन मेरा भगीरथ सा।।

©आशी प्रतिभा (स्वतंत्र लेखिका)

मध्य प्रदेश, ग्वालियर

भारत

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